इन्दौर । भगवान को धन सम्पत्ति नहीं, मन के श्रेष्ठ भाव चाहिए। वे छप्पन भोग के नहीं, हमारे प्रेम की भावना के भूखे हैं। रूक्मणी मगंल प्रसंग हमारी भारतीय संस्कृति और मर्यादा का गौरवशाली उजला पक्ष है। रूक्मणी विवाह आत्मा और परमात्मा के मिलन का प्रतीक है। कृष्ण योगेश्वर, लीलाधर और नटवर की यही विशेषता है कि वे कृपा वर्षा करते भी हैं तो पता ही नहीं चलते देते। हमारी सभी देवी-देवता प्राणियों के उद्धार के लिए ही अवतरित होते हैं। 
ये दिव्य विचार हैं भागवताचार्य पं. नारायण शास्त्री के, जो उन्होंने आज मां अम्बिका नगर, विजय नगर स्थित मेट्रो टाॅवर के पीछे मंदिर परिसर में चल रहे भागवत ज्ञानयज्ञ में उपस्थित भक्तों को कृष्ण-रूक्मणी विवाह प्रसंग पर संबोधित करते हुए व्यक्त किए। कथा में विवाह का जीवंत उत्सव भी धूमधाम से मनाया गया। जैसे ही कृष्ण-रूक्मणी ने एक-दूसरे को वरमाला पहनाई, कथा स्थल जयघोष से गूंज उठा। प्रारंभ में व्यासपीठ का पूजन महिपाल यादव, लियूष यादव, बंटी भार्गव, सोनू चैहान, प्रेम विजयवर्गीय ने किया। आरती में पार्षद मुन्नालाल यादव, सरोज चैहान, कल्पेश विजयवर्गीय, योगेश शर्मा, ओमप्रकाश यादव, शानू यादव, राजेश अग्रवाल आदि ने किया। संयोजक महिपाल यादव ने बताया कि भागवत ज्ञानयज्ञ का समापन 19 अप्रैल शुक्रवार को सुबह 11 से दोपहर 2 बजे तक कथा के बाद मंदिर प्रांगण मां अम्बिका नगर पर होगा। कथा में सुदामा चरित्र की कथा एवं यज्ञ-हवन के साथ पूर्णाहुति होगी।  
आचार्य पं. शास्त्री ने कहा कि हमारे धर्मग्रंथ सुषुप्त समाज को जागृत एवं चैतन्य बनाते हैं। मनुष्य का जीवन हमें केवल पशुओं की तरह व्यवहार करने के लिए नहीं, बल्कि सदभाव, परमार्थ और सेवा करूणा जैसे प्रकल्पों के लिए भी मिला है। भगवान अनुभूति का विषय है। हृदय में पवित्र संकल्प आयेंगें तो विचारों का प्रवाह भी निर्मल हो जाएगा। भगवान की लीलाओं के दर्शन एवं श्रवण से मन के विकार दूर होते हैं और शरीर की इंन्द्रियों पर सात्विक प्रभाव होता है। आत्मा और परमात्मा का मिलन है कृष्ण-रूक्मणी विवाह।