वक्त की फिरंगी कमाल की होती है। हर मसले को पलभर में मथ के रख देती है। इस उल्टापलट को ढ़ोगी बाबा गुरमीत और गिरगिटिया चैनलों से बेहतर कौन समझ सकता है। कल तक जो चैनल मैसेंजर आफ गाँड.. के प्रोमो और प्राइम टाइम में बाबा के प्रायोजित इन्टरव्यू दिखाते थे वही अब इनके फुटेज का इस्तेमाल बाबा की रंगरँगीली दुनिया दिखाने में कर रहे हैं। रँगरीला बाबा भी टीवी के हिसाब से मुफीद है। बडे़ दिनों बाद रेडीमेड आइटम मिला है। वरना चैनलों में नमकमिर्च लगाने अलग से प्रपंच रचने पड़ते थे। बाबा अपने आपमें आल इन वन है। फुल फिल्मी मसाला। रहस्य, रोमांस, साजिश, रोमांच, थ्रिल सभी कुछ। एक चैनल में गुफा का रहस्य चल रहा है तो दूसरे में डेरे से आती रहस्यमयी चीख। अबतक चैनलों ने इतना इनवेस्टिगेशन कर लिया जो पुलिस को अभी करना बाकी है। बाबा के फिल्मों के अंश और इंटरव्यू  सोशलमीडिया की कृपा से मुझे भी देखने को मिले। बाबा बिलकुल जोगिंदर की फिल्म का रंगाखुश है। वही आवाज़ हाव भाव,वही अदा। जोगिंदर ने यह चरित्र सत्तर के दशक में रचा था। एक साइकोटिक विलेन जो अपनी ऊंटपटांग की हरकतों में ही खुश रहता है। कहते हैंं विचार कभी मरते नहीं,किसी के जरिए फलीभूत होते हैं। जोगिंदर होते तो आज कितने खुश होते,अपनी रचना को जीवंत होते देख। रंगाखुश नेट में है..बाबा में दिलचस्पी हो तो जरूर खोजकर देखें मजा आएगा।  
मित्र ने पूछा..एक बाबा का हश्र देखकर दूसरा क्यों नहीं सुधरता? मैंने प्रतिप्रश्न किया एक घूसखोर के पकड़े जाने के बाद भी दूसरा घूस क्यों लेता है? बाबालोगों और घूसखोरों के पकड़े जाने के बाद भी बाबा पैदा होते रहेंगें और घूसखोर भी। कुछ दिन पहले एक बाबा जिस्मफरोशी के जुर्म में पकड़ा गया था, जमानत पर छूटा तो फिर वही काम करने लगा। मैं गारंटी से ये बात करता हूँ कि आशाराम,रामपाल यदि जेल से छूटे तो वे भी फिर वही करने लगेंगे। आदमी में जानवरों वाली फितरत होती है। बिच्छू डंक मारता है,साँप डसता है यह उसका दुर्गुण नहीं चरित्र है। बाबा लोग भी दुर्गुणी नहीं,यह उनका चरित्र है। इनके मायाजाल में वही फँसता है जिसको फँसना ही है। इस बाबा से न सही उस बाबा से। आप ये समझते हो कि जो भगत इस बाबा के डेरे से मुक्त हुए वे क्या बचे रहेंगें.. नहीं.. किसी दूसरे डेरे में जा फँसेंगे। जैसे फँसाने वाले की फितरत होती है वैसे ही फँसने वालों की। दोनों परस्पर पूरक हैं। ये कालोंकाल से चला आ रहा है। तिलस्म विवेक को हर लेता है। रामचरितमानस में प्रतापभानु राजा की कथा है वह भी एक ढोंगी बाबा के चक्कर में फँसकर अपना नाश कराता है। हनुमान जैसे ग्यानी भी कालनेमि के चक्कर में फँस जाते हैं। भक्त लोग पुराण कथाओं में ये सब सुनते हैं पर वैसे ही जैसे उन कबूतरों को शिकारी से बचने के लिए एक संत ने बताया था। शिकारी के जाल में फँसने के बाद भी वे कबूतर संत द्वारा पढाया पाठ रटे जा रहे थे..शिकारी आएगा, चुग्गा डालेगा,जाल फैलाएगा जाल में नहीं फँसना चाहिए। 
ये संसार चक्र है। ऐसे ही चलता है, व्यक्ति ऊपर से जो लिखा के आया है उसे भोगना ही पड़ेगा.. हमारे मोहल्ले में चल रही कथा में एक साधु बाबा यही प्रवचन दे रहे थे। खाली हाथ आया है बच्चा खाली हाथ जाएगा.. माया हाथ की मैल है। यहां आकर धो ले। इन दिनों टीवी में बाबा के रियल्टी शो देखने के बाद भी बाबालोगों का प्रवचन सुनने को लोग उमड़ते हैं और भजनकीर्तन करते बाबा की व्यासगादी में ..हाथ का मैल..धो आते हैं। जजमान ब्रत उपवास करके कथा सुनते हैं बाबा हलवा पूरी डकरते हुए कथा कहते हैं। सातवें दिन भगतों और जजमानों के हाथ का धोया हुआ मैल बैग में भरा और चल पड़े किसी नए ठिकाने। पाप से मुक्ति और मोक्ष की कामना के लिए ..अर्पित इसी ..हाथ की मैल... से बाबाओं के डेरे और आश्रम बनते हैं। वहीं अंधी गुफाएं बनती हैं वहीं से चीखें आती हैंं। भगत लोग जाकर वहीं फँस जाते हैं।
टीवी वालों के लिए यह रियल्टीशो आयटम है। बाबा लोगों के पैसों से उनका महिमा मंडन करते हैं, उन्हें मैसेंजर आफ गाड.. बनाते हैं फिर मौका मिले तो उन्हीं का बाजा बजाते हैं। एक समय आशाराम दिनभर टीवी में आते थे प्रवचन करते हुए। वक्त की फिरंगी में फँसे तो ..उन्हीं चैनलों में...सच्ची खबरें कड़वे घूंट.. के साथ दिखने लगे। अब यही गुरमीत बाबा के साथ हो रहा है। परसों फिर कोई नया बाबा पकड़ में आया तो वह भी दिनभर चैनलों की खबरों में खेलरेगा..वक्त की फिरंगी ऐसे ही घूमती रहेगी।रहा सवाल चैनलों का तो बकौल निदा फाजली--

अपनी मर्जी से कहाँ अपने सफर के हम हैं
रुख हवाओं का जिधर को है उधर के हम हैं।