प्रोग्राम मैनेजर- सुना, तुम्हारी मां आई हुई हैं!
मैं- आकर चली भी गईं, कल ही शाम.
प्रोग्राम मैनेजर (चौकोर आंखों से)- अरे...! चली भी गईं! और तुम हम लोगों के लिए कुछ बनवाकर भी नहीं लाई!
मैं (उनसे भी बड़ी-मोटी आंखों के साथ)- आप भी ऐसा सोचती हैं? कल को मेरे पापा आएंगे तो भी क्या आप यही उम्मीद करेंगी?

ये सिर्फ एक सवाल था- हैरानी में रचा-पगा लेकिन मेरी मैनेजर नाराज़ हो गईं. तब तो कुछ कहा नहीं, लेकिन उसके बाद से मेरे अभिवादन का जवाब देना बंद कर दिया. अपने केबिन में बुलाकर कोई निर्देश देने की बजाए वहीं से चिल्लाकर बोलतीं. मेरे कैजुअल ड्रेस सेंस पर बड़ा वाला लैक्चर चेंपा गया, वो भी पब्लिक में. मेरी आपत्ति मां के आने पर उनसे खाना बनवाने की उनकी सोच पर थी.

बात-बेबात फेमिनिज्म का झंडा लहराने वाली मेरी मैनेजर अक्सर अपनी पुरुषवादी सोच से मुझे हैरान कर देती थीं. 

यह तो खैर एक संस्थान की बात रही, लेकिन बड़ी-बड़ी शख्सियतें भी अपने इंटरव्यू में ‘मां के हाथ का खाना’ की बाकायदा स्तुति करती हैं. करें, खूब करें, लेकिन जब यही बात जर्बदस्ती में बदल जाती है तो कोई अंदाजा भी नहीं लगा सकता कि मेरे जैसी रसोई-बैरन मां पर क्या गुज़रती है! मुझे किचन में जाना कभी अच्छा नहीं लगा. छठवीं में थी, तब मेरा सुबह स्कूल हुआ करता. भाई-बहन दोपहर में जाते. मां पढ़ाया करती थीं, उनकी भी दोपहर की शिफ्ट थी.

पहली बार घर पर सबकी एबसेंस में मेहमान आए तो बगल वाले भैया को चाय बनाने बुलाकर लाई. लेकिन फिर मैं चाय बनाना सीख गई. फिर स्कूल खत्म करते तक किचन से मेरा ताल्लुक चाय तक ही रहा. हां, बर्तन कभी-कभार धो दिया करती.

धीरे-धीरे बर्तन धोना मुझे तनाव से राहत देने लगा. दोस्त लोग परेशान होने पर स्मोक करते और मैं बर्तन धोती. धुले हुए बर्तन भी दोबारा-तिबारा. 

बहुत साल बाहर रहना भी मुझे कुकिंग से नहीं जोड़ सका. इसका फेमिनिज्म से कोई वास्ता नहीं था. मुझे खाना बनाना, बस, पसंद नहीं था. कभी-कभी कहती कि मेरे घर में किचन कंसेप्ट नहीं होगा. मेरे पार्टनर को खाना पकाना खूब बढ़िया आता, उसे खाना भी उतना ही पसंद था, लेकिन उसके दिल तक जाने के लिए भी मैं कभी खाना नहीं बना सकी.

किचन से इतना दूर भागने वाली, बेटी के जन्म के बाद एकदम से बदली. अन्नप्राशन सेरेमनी के दूसरे दिन घर पर फोन खड़काया. उसे क्या खिला सकते हैं! कॉल करते वक्त अपने-आपको एक बड़ी सी लिस्ट सुनने के लिए तैयार कर लिया था. ऐसा कुछ नहीं हुआ.

वही-वही सूजी की खीर भला रोज कोई कैसे खा सकता है. फिर मैं डॉक्टर के पास गई- बेटी को क्या खिलाएं? ऐसे ही तो वो मेरा पसंदीदा डॉक्टर नहीं था. उसने एक लंबी सी लिस्ट बना दी. कब, किस वक्त और कितनी क्वांटिटी में क्या देना है, एक कागज पर सिलसिलेवार सब लिखा.

घर आकर शुरू हुई मेरी मेहनत. गूगल करके सब सीखा. बनाया. बेटी को गोद में लिया और खिलाने की कोशिश शुरू की. यकीन जानिए, घंटों कैसे निकल जाते, कुछ पता ही नहीं चलता. वो नहीं खाती, मैं खिलाती. रो-रो पड़ती कि मैं इतनी मेहनत से कुकिंग कर रही हूं और ये कुछ खा नहीं रही. वो भी रो पड़ती. मैं एकदम बौराकर दोबारा डॉक्टर के पास गई. उसने कहा कि मील-टाइम खुशनुमा होना चाहिए. एक टॉनिक दिया और साथ में मीठी मुस्कान के साथ सॉरी कि यहां मैं कुछ नहीं कर सकता. नहीं खाना कोई बीमारी नहीं, ये आपको ही ठीक करना होगा.

लौटकर मुझपर खुशनुमा मील-टाइम की झक सवार हुई. खाने के लिए उसे डांटना नहीं है, ये तो समझ गई लेकिन खुशनुमा किस बला का नाम है.

खाने के साथ मोबाइल पर गाने सुनाना शुरू किया. वो गाने सुनती और मैं उसके मुंह में चम्मच घुसाड़ती. दो-चार रोज में ये टोटका भी फेल हो गया. फिर कोई नया तरीका निकाला. अब आए-दिन कुछ ईजाद कर लेती हूं ताकि उसे खुशनुमा मील-टाइम दे सकूं.

अब बेटी पांव-पांव दौड़ती है और पीछे-पीछे चम्मच-कटोरी लिए मां-पिता को बराबर दौड़ाती है. सुबह का वो वक्त, जिसमें मैं कभी अलमस्त सोया करती, अब बिना अलार्म जाग जाती हूं. खुशी से किचन में जाती हूं कि उसके लिए कुछ-कुछ पकाऊं. छप्पन भोग तो खैर अब भी नहीं बना पाती लेकिन जो भी बनाऊं, मेरी बेटी के लिए वो छप्पन भोग से कुछ कम भी नहीं होता होगा. कम से कम खाते वक्त उसका किलकता चेहरा तो यही कहता है.